नेहा बोरा के वकील ने लोकतंत्र और सत्ता परिवर्तन पर क्या कहा?
सुनवाई के दौरान नेहा बोरा के वकील गोपाल शंकर नारायण ने अदालत में लोकतंत्र और सरकार बदलने की मांग को लेकर अपनी दलील रखी। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन या रिजीम चेंज की मांग करना गलत नहीं है। किसी व्यक्ति को इस तरह की मांग रखने का अधिकार है।
इस दलील पर दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन का रास्ता चुनाव है। दिल्ली के बीचों-बीच इकट्ठा होकर उपद्रव करने वाले लोगों के जरिए सत्ता परिवर्तन नहीं किया जा सकता। इस तरह दोनों पक्षों ने अदालत के सामने अपना पक्ष रखा।
राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए अनुमति की जरूरत पर उठे सवाल
नेहा बोरा के वकील गोपाल शंकर नारायण ने सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय ध्वज फहराने और इलाके में लागू प्रतिबंधों को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने अदालत को बताया कि संबंधित इलाके में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 लागू नहीं थी, लेकिन लाउडस्पीकर के जरिए लोगों को बताया जा रहा था कि यह धारा लागू है।
वकील ने कहा कि नोटिस में बिना अनुमति के राष्ट्रीय ध्वज फहराने का जिक्र किया गया है, जबकि राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए अनुमति की जरूरत होने की बात पर उन्होंने सवाल उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि नेहा बोरा ने कनॉट प्लेस को लेकर कोई ऐसी बात नहीं कही थी, जिससे नोटिस में दर्ज आरोपों को सही ठहराया जा सके। अब अदालत को यह देखना है कि नोटिस जारी करने की प्रक्रिया और उसमें दर्ज तथ्यों का कानूनी आधार क्या था।
BNSS की धारा 126 और 130 पर दिल्ली हाईकोर्ट ने क्या पूछा?
सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से BNSS की धारा 126 और 130 के इस्तेमाल को लेकर कई अहम सवाल किए। अदालत ने पूछा कि अगर किसी मजिस्ट्रेट को केवल यह जानकारी मिलती है कि कोई व्यक्ति वहां नारे लगा रहा था, तो क्या बिना जांच किए ही उसके खिलाफ नोटिस जारी किया जा सकता है?
कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि मजिस्ट्रेट के लिए यह जांचना जरूरी नहीं है कि मिली हुई जानकारी भरोसेमंद है या नहीं। अदालत ने एक ऐसी स्थिति का उदाहरण दिया, जिसमें संबंधित व्यक्ति के किसी दूसरे स्थान पर भाषण देने की खबर सामने आई हो। ऐसे में कार्रवाई करने से पहले तथ्यों की स्वतंत्र रूप से जांच करना कितना जरूरी है?
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने पूछा कि जब धारा 126 और 130 को साथ में इस्तेमाल किया जाता है, तो क्या इससे यह संकेत मिलता है कि मजिस्ट्रेट ने पहले ही कार्रवाई करने का मन बना लिया था? अदालत ने पुलिस से यह भी स्पष्ट करने को कहा कि अपराध होने की आशंका से जुड़ी जानकारी का कानूनी मतलब क्या है।
दिल्ली पुलिस ने नेहा बोरा के खिलाफ क्या दलील दी?
दिल्ली पुलिस की ओर से ASG चेतन शर्मा ने अदालत में कहा कि अगर किसी व्यक्ति से शांति भंग होने की आशंका है, तो BNSS की धारा 126 और 130 को साथ में लागू किया जा सकता है। उनके मुताबिक, इन दोनों धाराओं को पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने दलील दी कि कानून की तकनीकी व्याख्या में उलझने से सार्वजनिक शांति बनाए रखने का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।
चेतन शर्मा ने एडवोकेट प्रशांत भूषण की प्रेस कॉन्फ्रेंस का भी जिक्र किया। उन्होंने अदालत को बताया कि CJP के नेताओं के साथ नेहा बोरा भी मौजूद थीं। ASG के मुताबिक, इस दौरान प्रशांत भूषण ने इसे रिजीम चेंज की लड़ाई बताते हुए सत्ता परिवर्तन कराने की बात कही थी। दिल्ली पुलिस ने यह भी आरोप लगाया कि नेहा बोरा ने 12 बार नियमों का उल्लंघन किया है।
23 अक्टूबर को आएगा नेहा बोरा मामले में फैसला
नेहा बोरा की याचिका पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। अब सभी की नजरें शुक्रवार, 23 अक्टूबर को आने वाले फैसले पर टिकी हैं। अदालत का निर्णय यह स्पष्ट करेगा कि नेहा बोरा की ओर से चुनौती दिए गए नोटिस पर क्या रुख अपनाया जाता है।
