Two Child Policy: दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, कहा- अब प्रासंगिकता खत्म

देश में दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानूनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि तेजी से घटती प्रजनन दर के मौजूदा दौर में ऐसे कानून अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। आबादी नियंत्रण के उद्देश्य से बनाए गए इन कानूनों पर अब दोबारा विचार करने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को बड़ी बेंच के पास भेजने का फैसला किया है।

दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने की रोक पर सवाल

जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस अलोक अराधे की पीठ महाराष्ट्र के उस कानून से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें दो से ज्यादा बच्चे होने पर किसी व्यक्ति को पंचायत सदस्य या सरपंच बनने से अयोग्य ठहराया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि आज के दौर में तीन बच्चे होना दुर्लभ होता जा रहा है। परिवारों में एक बच्चा होने का चलन बढ़ रहा है। ऐसे में जनसंख्या नियंत्रण के लिए बनाई गई इस नीति को जारी रखने का औचित्य क्या है?

पीठ ने यह भी चिंता जताई कि चुनाव में प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार एक-दूसरे के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल हथियार की तरह करते हैं।

भारत में प्रजनन दर घटकर 1.9 पहुंची

सुप्रीम कोर्ट ने देश में बदलती जनसांख्यिकी का जिक्र करते हुए कहा कि साल 2003 में भारत की कुल प्रजनन दर (TFR) करीब 3 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। जबकि किसी देश में आबादी की एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी से बदलने के लिए 2.1 की प्रजनन दर को रिप्लेसमेंट रेट माना जाता है।

अदालत ने कहा कि भारत की कुल आबादी अभी घट नहीं रही है, लेकिन प्रजनन दर का रिप्लेसमेंट लेवल से नीचे जाना भविष्य में बड़े जनसांख्यिकीय बदलाव का संकेत है।

इसका असर आने वाले समय में बुजुर्गों की बढ़ती आबादी और कामकाजी उम्र के लोगों के घटते अनुपात के रूप में दिखाई दे सकता है। अदालत ने चेतावनी दी कि बदलती परिस्थितियों को नजरअंदाज करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

तीन जजों की बेंच करेगी पुराने फैसलों पर विचार

सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने दो से ज्यादा बच्चे होने पर चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानूनों की संवैधानिक वैधता से जुड़े बड़े सवाल को तीन जजों की बेंच के पास भेज दिया है।

अदालत ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा मामले में दिए गए फैसले पर भी दोबारा विचार की जरूरत बताई है। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा में दो बच्चों की नीति को संवैधानिक रूप से वैध माना था।

अब बदलती जनसंख्या और प्रजनन दर को देखते हुए इस फैसले की दोबारा समीक्षा का रास्ता खुला है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव इंगले की याचिका से जुड़ा है। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें दो से ज्यादा बच्चे होने के आधार पर उनकी अयोग्यता को बरकरार रखा गया था।

महाराष्ट्र विलेज पंचायत एक्ट, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के तहत दो से ज्यादा बच्चे होने पर कोई व्यक्ति पंचायत सदस्य या सरपंच का चुनाव नहीं लड़ सकता। इतना ही नहीं, यदि कोई निर्वाचित प्रतिनिधि इस प्रावधान के दायरे में आता है तो उसे पद से अयोग्य भी ठहराया जा सकता है।

मंगला इंगले को तीसरे बच्चे के जन्म के आधार पर अयोग्य घोषित किया गया था। इसके बाद उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां से राहत नहीं मिलने पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों पर भी उठे सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपने पुराने फैसलों पर भी दोबारा विचार करने की जरूरत बताई है। इनमें प्रमुख रूप से 2003 का जावेद बनाम हरियाणा मामला शामिल है, जिसमें दो से ज्यादा बच्चों वाले लोगों को पंचायत चुनाव लड़ने से रोकने वाले कानून को बरकरार रखा गया था।

इसके अलावा 2024 के रामजी लाल जाट बनाम राजस्थान मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने दो बच्चों की शर्त से जुड़े नियम को बरकरार रखा था।

अब तीन जजों की बेंच इन कानूनी प्रावधानों और पुराने फैसलों पर विचार करेगी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा टिप्पणी का मतलब यह नहीं है कि देशभर में दो बच्चों की नीति से जुड़े सभी कानून तत्काल खत्म हो गए हैं। इनकी संवैधानिक वैधता पर आगे बड़ी बेंच विचार करेगी।

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