भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों, आपूर्तिकर्ता देशों के साथ संबंधों और समुद्री व्यापार मार्गों में होने वाले बदलाव का सीधा असर देश की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है।
रूस बना भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर
भारत के कच्चे तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगातार महत्वपूर्ण बनी हुई है। अक्टूबर 2026 में रूस से करीब 19.7 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल भारत पहुंचा। यह कुल आयात का लगभग 35 फीसदी है।
हालांकि, रूस की हिस्सेदारी जुलाई 2026 के करीब 55 फीसदी के स्तर से घट गई है। इससे साफ है कि भारतीय रिफाइनरियां अब दूसरे देशों से भी तेल की खरीद बढ़ा रही हैं। रूस अभी भी भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।
अमेरिका और UAE से भी हो रही तेल की खरीद
भारत रूस के अलावा खाड़ी देशों और अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों से भी कच्चा तेल खरीद रहा है। अक्टूबर में मध्य पूर्व से करीब 23 लाख बैरल प्रतिदिन तेल की आपूर्ति हुई।
संयुक्त अरब अमीरात (UAE), इराक और सऊदी अरब भारत के प्रमुख क्षेत्रीय आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हैं। वहीं, अमेरिका से भी भारत कच्चे तेल की खरीद करता है। इसके अलावा अंगोला और वेनेजुएला जैसे देशों से आयात में भी अक्टूबर के दौरान बढ़ोतरी दर्ज की गई।
ध्यान देने वाली बात है कि रूस की 35 फीसदी हिस्सेदारी अक्टूबर के आंकड़ों पर आधारित है, जबकि UAE की 17.4 फीसदी और अमेरिका की 5.1 फीसदी हिस्सेदारी अगस्त 2026 के आंकड़ों से संबंधित है। अलग-अलग महीनों के आंकड़ों को एक साथ नहीं देखना चाहिए।
भारत विदेशी तेल पर क्यों निर्भर है?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। घरेलू उत्पादन सीमित होने और पेट्रोलियम उत्पादों की मांग अधिक रहने के कारण विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता बनी हुई है।
यही वजह है कि भारत की ऊर्जा नीति में अलग-अलग देशों से तेल खरीदना महत्वपूर्ण है। इससे किसी एक देश या समुद्री मार्ग पर निर्भरता कम करने और कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच बेहतर विकल्प चुनने में मदद मिलती है।
आगे बदल सकती है तेल आयात की रणनीति
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों, माल ढुलाई के खर्च और भू-राजनीतिक परिस्थितियों के आधार पर भारतीय रिफाइनरियां अपनी खरीद रणनीति में बदलाव कर सकती हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले महीनों में रूस से तेल की आपूर्ति पर माल ढुलाई की बढ़ती लागत का असर पड़ सकता है। वहीं, मध्य पूर्व, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से मिलने वाली आपूर्ति भारत के लिए वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध करा सकती है।
