जेम्स मिल की इतिहास लेखन पद्धति पर उठाए सवाल
‘इतिहास-लेखन और प्रारंभिक भारतीय इतिहास’ विषय पर व्याख्यान देते हुए रोमिला थापर ने ब्रिटिश इतिहासकार जेम्स मिल की इतिहास लेखन पद्धति की आलोचना की। उन्होंने बताया कि भारतीय इतिहास को हिंदू, मुस्लिम और ब्रिटिश कालखंडों में बांटने से देश के ऐतिहासिक अनुभवों को धार्मिक आधार पर देखने की प्रवृत्ति मजबूत हुई।
थापर के अनुसार, औपनिवेशिक इतिहासकारों ने कई सामाजिक और राजनीतिक संघर्षों को केवल धार्मिक दुश्मनी के नजरिए से समझाया, जबकि इनके पीछे अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण भी मौजूद थे।
हल्दीघाटी युद्ध का दिया उदाहरण
रोमिला थापर ने ऐतिहासिक घटनाओं की व्याख्या करते समय एक ही कारण पर निर्भर रहने के बजाय उनके व्यापक संदर्भ को समझने की जरूरत पर जोर दिया। उनके विचार में, अतीत के संघर्षों को केवल धार्मिक टकराव के रूप में प्रस्तुत करना इतिहास की वास्तविक जटिलताओं को नजरअंदाज कर सकता है।
उन्होंने इतिहास के वि-औपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में पुरातत्व और आनुवंशिकी से प्राप्त नए साक्ष्यों को महत्व देने की बात भी कही। उनके अनुसार, ऐतिहासिक निष्कर्षों को प्रमाणों और शोध के आधार पर परखा जाना चाहिए।
जगन्नाथ और विट्ठल की परंपराओं में विविधता पर जोर
थापर ने भारतीय धार्मिक परंपराओं की विविधता का उल्लेख करते हुए ओडिशा के भगवान जगन्नाथ और महाराष्ट्र के विट्ठल का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि भारतीय धार्मिक परंपराओं को एकसमान और स्थिर रूप में देखना उनकी ऐतिहासिक विविधता को नजरअंदाज करना है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब इतिहास की व्याख्या समकालीन राजनीतिक विचारों के आधार पर की जाती है, तो अतीत को समझने का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। उनके विचार में, इतिहास लेखन में प्रमाणों, विविध परंपराओं और आलोचनात्मक दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
इतिहास की व्याख्या में प्रमाणों की अहमियत
रोमिला थापर के वक्तव्य का मुख्य संदेश यह है कि भारतीय इतिहास को किसी एक धार्मिक या राजनीतिक नजरिए तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इतिहास की बेहतर समझ के लिए पुरातात्विक साक्ष्यों, आनुवंशिक शोध और विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों का निष्पक्ष विश्लेषण जरूरी है।
