राजभर ने यह भी कहा कि इस समय प्रदेश में कई बड़े काम एक साथ होने हैं। विधानसभा चुनाव, जनगणना और यूपी बोर्ड की परीक्षाएं भी इसी अवधि में होनी हैं। ऐसे में सरकार सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उचित कदम उठाएगी। अब सवाल यह है कि क्या पंचायत चुनाव तय समय में हो पाएंगे या सरकार के सामने कुछ नई चुनौतियां आएंगी?
प्रधानों का कार्यकाल खत्म, अब प्रशासक संभाल रहे जिम्मेदारी
उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 25 मई को खत्म हो गया था। इसके बाद सरकार ने ग्राम प्रधानों को प्रशासक के तौर पर काम करने की जिम्मेदारी दी थी। वहीं, जुलाई में ब्लॉक प्रमुखों और जिला पंचायत अध्यक्षों का कार्यकाल पूरा होने के बाद उन्हें भी प्रशासक बना दिया गया। फिलहाल पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की जगह प्रशासकों के जरिए कामकाज चल रहा है। हाईकोर्ट ने भी अपने आदेश में ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में काम करते रहने की अनुमति दी है। ऐसे में चुनाव होने तक पंचायतों का कामकाज इसी व्यवस्था के तहत जारी रह सकता है।
आरक्षण की रिपोर्ट का इंतजार
पंचायत चुनाव की तैयारियों के बीच ओबीसी आरक्षण का मुद्दा भी काफी अहम है। उत्तर प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग मतदाता सूची 10 जून को जारी कर चुका है और चुनाव की तैयारियां भी काफी आगे बढ़ चुकी हैं। हालांकि, सीटों पर आरक्षण तय होने से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट का इंतजार है।
राज्य सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी का आरक्षण तय करने के लिए 20 मई को समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था। आयोग का छह महीने का कार्यकाल नवंबर में पूरा होना है। रिपोर्ट आने के बाद ही आरक्षण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी और सीटों के हिसाब से चुनाव की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा सकेगा।
तीन महीने में पंचायत चुनाव कराने का निर्देश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में तीन महीने के भीतर पंचायत चुनाव कराने का आदेश दिया है। पंचायत चुनाव से जुड़ी कई याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामले में राज्य सरकार की ओर से परिसीमन का हवाला देते हुए चुनाव टालने की दलील दी गई थी। वहीं, याचिकाकर्ताओं ने सरकार के 25 और 26 मई के आदेशों को चुनौती दी थी। इन आदेशों के जरिए चुनाव टालने और ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में काम जारी रखने की अनुमति दी गई थी।
संविधान के प्रावधानों का भी दिया गया हवाला
याचिका में उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) का हवाला देते हुए कहा गया कि पंचायत चुनाव टालने का फैसला संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है। याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2000 में प्रेम लाल पटेल मामले में हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले का भी उल्लेख किया। उनके मुताबिक, उस फैसले में संबंधित प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 243ई और 243के के खिलाफ मानते हुए असंवैधानिक करार दिया गया था।
फिलहाल पंचायत चुनाव की तारीखों को लेकर सरकार के अगले फैसले का इंतजार है। ओबीसी आरक्षण की रिपोर्ट, कोर्ट के आदेश और दूसरी जरूरी प्रक्रियाओं के बीच चुनाव की तस्वीर साफ होगी। अब देखना होगा कि सरकार इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए पंचायत चुनाव की प्रक्रिया कब आगे बढ़ाती है।
