Jagdambika Pal: वरिष्ठ भाजपा सांसद जगदंबिका पाल को मंगलवार को संसद की संयुक्त समिति (JPC) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। यह समिति विवादास्पद वक्फ (संशोधन) विधेयक की जांच करेगी। लोकसभा की एक अधिसूचना के अनुसार, अध्यक्ष ओम बिरला ने 31 सदस्यीय समिति के प्रमुख के रूप में पाल की नियुक्ति की घोषणा की है। यह कदम तब उठाया गया है जब विधेयक के प्रावधानों को लेकर लोकसभा में विपक्ष द्वारा विरोध जताया गया था।
संयुक्त समिति के सदस्य और संरचना
संयुक्त समिति में कुल 31 सदस्य होंगे, जिनमें 21 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से होंगे। समिति को अगले सत्र तक अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। जगदंबिका पाल, जो उत्तर प्रदेश से चौथी बार सांसद बने हैं, को सभी दलों के साथ मधुर संबंध रखने वाले एक अनुभवी सांसद के रूप में देखा जाता है। यह समिति विधेयक के सभी पहलुओं की गहराई से जांच करेगी और इसके प्रभावों पर ध्यान देगी।
विधेयक पर विपक्ष और सरकार के बीच मतभेद
विधेयक को पिछले गुरुवार को लोकसभा में पेश किया गया था। इसके बाद, बहस के दौरान विधेयक को संयुक्त समिति को भेजने का निर्णय लिया गया। सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि प्रस्तावित कानून का मस्जिदों के कामकाज में हस्तक्षेप करने का इरादा नहीं है। इसके बावजूद, विपक्ष ने विधेयक को मुसलमानों को निशाना बनाने और संविधान पर हमला करने के रूप में देखा है। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने इस मुद्दे पर चर्चा की और विधेयक के उद्देश्य को स्पष्ट करने की कोशिश की है।
समिति का गठन और नामित सदस्य
लोकसभा और राज्यसभा ने पिछले शुक्रवार को केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था। इसमें समिति के सदस्य और उनके नामों की घोषणा की गई थी। निचले सदन में, पैनल के 12 सदस्य सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से हैं, जिनमें आठ भाजपा से और नौ विपक्ष से हैं। उच्च सदन में, समिति में चार भाजपा से, चार विपक्ष से, एक वाईएसआरसीपी से है, जो विधेयक का विरोध कर रही है, और एक नामित सदस्य शामिल हैं।
रिपोर्ट पेश करने की समयसीमा
रिजिजू ने समिति को निर्देश दिया है कि वह अगले सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी रिपोर्ट लोकसभा में प्रस्तुत करे। यह रिपोर्ट विधेयक के विभिन्न पहलुओं की विस्तृत समीक्षा करेगी और इसके संभावित प्रभावों पर एक निष्पक्ष राय प्रदान करेगी। समिति की सिफारिशें विधेयक के भविष्य के बारे में महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश प्रदान करेंगी और संसद के दोनों सदनों में आगे की बहस के लिए आधार तैयार करेंगी।
यह नियुक्ति और समिति का गठन इस बात की ओर इशारा करता है कि सरकार विधेयक पर सभी दृष्टिकोणों को ध्यान में रखते हुए एक सुविचारित निर्णय लेना चाहती है, जबकि विपक्ष इसे संविधान और अल्पसंख्यक अधिकारों पर संभावित प्रभाव के रूप में देख रहा है।
