Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने योग गुरु रामदेव और उनके सहयोगी बालकृष्ण को पतंजलि उत्पादों से संबंधित भ्रामक विज्ञापन मामले में कुछ राहत दी है। कोर्ट ने अवमानना की कार्यवाही को बंद कर दिया है, लेकिन साथ ही सख्त चेतावनी भी दी है कि भविष्य में किसी भी कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि रामदेव और बालकृष्ण की माफी को स्वीकार किया जा रहा है, लेकिन उन्हें भविष्य में किसी भी कोर्ट के आदेश का उल्लंघन नहीं करने की सख्त चेतावनी दी गई है। कोर्ट ने कहा कि उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए हलफनामे पूरी सच्चाई के साथ होने चाहिए।
कोविड-19 और कोरोनिल विवाद
यह मामला 2021 में लॉन्च की गई पतंजलि की दवा कोरोनिल से जुड़ा है। रामदेव ने दावा किया था कि कोरोनिल “कोविड-19 के लिए पहली साक्ष्य-आधारित दवा” है, लेकिन इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने इसे “सरासर झूठ” बताया था। इसके अलावा, रामदेव ने एलोपैथी को लेकर भी विवादित बयान दिया था, जिससे चिकित्सा जगत में खलबली मच गई थी।
IMA और पतंजलि के बीच विवाद
IMA ने पतंजलि के खिलाफ भ्रामक विज्ञापनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका में कहा गया कि पतंजलि द्वारा प्रचारित विज्ञापन लोगों को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं। कोर्ट ने पिछले साल पतंजलि को ऐसे दावों के खिलाफ चेतावनी दी थी और भारी जुर्माना लगाने की धमकी दी थी।
सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी
इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट को एक गुमनाम पत्र प्राप्त हुआ जिसमें पतंजलि द्वारा लगातार भ्रामक विज्ञापन जारी किए जाने की जानकारी दी गई थी। इसके बाद कोर्ट ने पतंजलि से स्पष्टीकरण मांगा और रामदेव और बालकृष्ण को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का आदेश दिया।
मामले का निष्कर्ष
रामदेव और बालकृष्ण की माफी को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना की कार्यवाही को बंद कर दिया है, लेकिन साथ ही भविष्य में कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन न करने की सख्त चेतावनी दी है।
निष्कर्ष
इस पूरे मामले से यह स्पष्ट होता है कि भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट बेहद सख्त रुख अपनाए हुए है। पतंजलि जैसी बड़ी कंपनियों को भी न्यायपालिका के आदेशों का पालन करना अनिवार्य है। कोर्ट की इस चेतावनी के बाद उम्मीद है कि भविष्य में ऐसे मामले सामने नहीं आएंगे, और उपभोक्ताओं को भ्रामक विज्ञापनों से बचाया जा सकेगा।
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