Delhi: दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने गाजीपुर लैंडफिल में आग बुझाने के लिए नई तकनीक की मांग की है, क्योंकि पारंपरिक तरीकों से आग पर नियंत्रण पाना मुश्किल हो रहा है। हाल ही में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) को एक रिपोर्ट में एमसीडी ने बताया कि इस साल गाजीपुर लैंडफिल में लगी आग एकमात्र घटना है और अब तक के उपायों के बावजूद समस्या बनी हुई है।
आग बुझाने के पारंपरिक तरीके नाकाम
Delhi: गाजीपुर लैंडफिल में आग लगने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। पारंपरिक पानी ले जाने वाली दमकल गाड़ियों से इन आगों को बुझाना मुश्किल हो रहा है। एमसीडी ने इस समस्या का समाधान खोजने के लिए अग्निशामक विभाग से संपर्क किया है, ताकि नई तकनीक या उपकरण तैयार किए जा सकें।
नई तकनीक और रसायनों की आवश्यकता
एमसीडी ने अग्निशामक विभाग से नई कार्यप्रणाली और रसायनों के लिए अनुरोध किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पारंपरिक दमकल गाड़ियों द्वारा पानी का छिड़काव इन आगों को नियंत्रित करने में असफल रहा है। अग्निशामक विभाग से विशेष प्रकार के उपकरण और तकनीक की आवश्यकता महसूस की जा रही है, जो मीथेन गैस से उत्पन्न आग पर प्रभावी तरीके से नियंत्रण पा सकें।
गाजीपुर लैंडफिल की समस्याएं
दिल्ली में कुल तीन प्रमुख लैंडफिल साइट्स हैं – गाजीपुर, ओखला, और भलस्वा। इनमें गाजीपुर साइट सबसे अधिक समस्याग्रस्त रही है। यहाँ पिछले साल 12 जून और 21 अप्रैल को दो बड़ी आग की घटनाएं दर्ज की गई थीं। इन घटनाओं में मीथेन गैस और अस्थिर लैंडफिल जैसी चुनौतियाँ प्रमुख रही हैं।
आग लगने की घटनाओं का इतिहास
2016-17 में दिल्ली के लैंडफिल में 54 आग लगने की घटनाएं दर्ज की गई थीं, जिनमें से 23 बड़ी थीं। 2017-18 में यह आंकड़ा 31 तक पहुँच गया, जिसमें 26 बड़ी आग की घटनाएं शामिल थीं। इसके बाद के वर्षों में आग लगने की घटनाओं में गिरावट देखी गई, लेकिन गाजीपुर लैंडफिल में अभी भी समस्याएं बनी हुई हैं।
उपाय और भविष्य की योजना
एमसीडी ने आग लगने की घटनाओं को नियंत्रित करने के लिए कई उपाय किए हैं, जैसे कि गश्त करने वाले कर्मचारियों की तैनाती, मीथेन गैस को छोड़ने के लिए पाइपों का उपयोग, और लैंडफिल साइट्स पर बाड़ लगाने का प्रस्ताव। इसके अलावा, अग्निशामक विभाग से जल्द ही नई तकनीक और सुझावों के साथ जवाब मिलने की उम्मीद है।
दिल्ली में लैंडफिलों में आग लगने की घटनाओं को कम करने और प्रभावी समाधान खोजने के लिए एमसीडी और अग्निशामक विभाग की यह पहल महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। नई तकनीकों और उपकरणों की मदद से भविष्य में इन समस्याओं का स्थायी समाधान संभव हो सकता है।
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