प्रथम विश्व युद्ध में हुई सैनिटरी पैड्स की शुरुआत
सैनिटरी पैड्स के इतिहास की जड़ें प्रथम विश्व युद्ध से जुड़ी हैं। उस समय युद्ध के मैदान में घायल होने वाले सैनिकों के इलाज के लिए ऐसी सामग्री की जरूरत थी, जो बड़ी मात्रा में खून और दूसरे तरल पदार्थों को तेजी से सोख सके।
इसी जरूरत को देखते हुए फ्रांस में काम करने वाली नर्सों ने सैनिकों के इलाज के दौरान डिस्पोजेबल पट्टियों का इस्तेमाल शुरू किया। इन पट्टियों की खासियत थी कि ये तरल पदार्थ को तेजी से सोख सकती थीं और इस्तेमाल के बाद इन्हें फेंका जा सकता था।
लकड़ी के गूदे से बनाए जाते थे शुरुआती पैड
शुरुआती सैनिटरी पैड्स के विकास में लकड़ी के गूदे यानी वुड पल्प की अहम भूमिका रही। यह सामग्री काफी मात्रा में तरल पदार्थ सोखने में सक्षम थी। साथ ही, इसकी उपलब्धता और कम कीमत के कारण बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल करना आसान था।
युद्ध के दौरान इस तरह की सामग्री ने घायल सैनिकों की देखभाल को आसान बनाया। डिस्पोजेबल होने के कारण इसे इस्तेमाल के बाद हटाया जा सकता था, जिससे बार-बार कपड़े की पट्टियों को धोने और इस्तेमाल करने की जरूरत भी कम हुई।
युद्ध से महिलाओं की पर्सनल हाइजीन तक पहुंचा सफर
युद्ध के दौरान इस्तेमाल होने वाली इस सोखने वाली सामग्री ने आगे चलकर महिलाओं की मासिक धर्म संबंधी जरूरतों के लिए नए विकल्पों का रास्ता खोला। इसी तकनीक से प्रेरित होकर डिस्पोजेबल सैनिटरी उत्पाद विकसित किए गए।
समय के साथ सैनिटरी पैड्स के डिजाइन, सोखने की क्षमता और आराम में कई बदलाव हुए। आज बाजार में अलग-अलग आकार, मोटाई और जरूरत के हिसाब से कई तरह के सैनिटरी पैड्स उपलब्ध हैं।
इस तरह युद्ध के मैदान में सैनिकों के इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली सोखने वाली सामग्री ने महिलाओं की मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति की नींव रखने में योगदान दिया।
