दरअसल, राहुल गांधी ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया था। इसमें उन्होंने पीएम मोदी को खुली बहस की चुनौती दी थी। राहुल ने कहा था कि प्रधानमंत्री कहते हैं कि विपक्ष देशद्रोही है, ऐसे में वह किसी भी मंच पर उनके साथ डिबेट करने के लिए तैयार हैं। वीडियो में राहुल गांधी ने पीएम मोदी को दिवाली की शुभकामनाएं देते हुए लाल गुलाब भी दिखाया था।
लाल गुलाब को लेकर भी राहुल पर कसा तंज
राहुल गांधी के वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया पर अपना एक वीडियो पोस्ट किया। इसमें उन्होंने लाल गुलाब को लेकर तंज कसते हुए कहा कि गुलाब वैलेंटाइन डे पर दिया जाता है, दिवाली पर नहीं।
हिमंत ने कहा, “राहुल जी, कल आपने एक वीडियो पोस्ट किया। हाथ में आपके रोज था और आप प्रधानमंत्री जी को हैप्पी दिवाली बोल रहे थे। राहुल जी, रोज वैलेंटाइन डे पर दिए जाते हैं। दिवाली पर रोज नहीं दिया जाता।” उन्होंने आगे कहा कि राहुल गांधी को भारतीय संस्कृति की जानकारी होनी चाहिए।
‘डिबेट करनी है तो संसद में कीजिए’
असम के मुख्यमंत्री ने राहुल गांधी के नेता प्रतिपक्ष होने का जिक्र करते हुए सवाल किया कि अगर वह इस पद पर हैं तो प्रधानमंत्री के साथ उनकी बहस कहां होनी चाहिए? सड़क पर, किसी गली में या संसद में?
हिमंत ने कहा कि संसद में स्पीकर मौजूद हैं और राहुल गांधी के परिवार के सदस्य भी सदन में हैं। ऐसे में बहस संसद के भीतर हो सकती है। उन्होंने राहुल गांधी से अपील की कि वह सदन में शांति से चर्चा करें और हंगामा न करें, ताकि जनता भी मुद्दों पर होने वाली बहस सुन सके।
US डील और बोफोर्स का मुद्दा उठाया
हिमंत बिस्वा सरमा ने राहुल गांधी की ओर से अमेरिका के साथ डील और विदेश नीति पर बहस की मांग का भी जवाब दिया। उन्होंने सवाल किया कि अमेरिका के साथ किस डील पर चर्चा की जानी है। इसके साथ ही उन्होंने बोफोर्स और भोपाल गैस त्रासदी जैसे मुद्दों का जिक्र करते हुए कहा कि संसद में इन विषयों पर भी बहस होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि इस बार राहुल गांधी संसद में बहस की शुरुआत करें और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जवाब देने का मौका दें। हिमंत ने यह भी अपील की कि चर्चा के दौरान सदन में हंगामा नहीं होना चाहिए।
‘यह बांग्लादेश या नेपाल नहीं है’
अपने वीडियो में हिमंत ने राहुल गांधी पर सड़क पर बहस के लिए लोगों को बुलाने को लेकर भी हमला बोला। उन्होंने कहा कि भारत में सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक चर्चा लोकतांत्रिक संस्थाओं के जरिए होती है। यह बांग्लादेश या नेपाल नहीं है।
