कितने किलोमीटर तक असर दिखाता है चक्रवाती तूफान? जानिए 2200 KM तक कैसे बदल जाता है मौसम

भारत के अलग-अलग हिस्सों में इन दिनों मौसम का मिजाज तेजी से बदल रहा है। चक्रवाती तूफान और वेस्टर्न डिस्टरबेंस जैसी मौसमी प्रणालियों के प्रभाव से कई राज्यों में बारिश, तेज हवाएं, आंधी और ओलावृष्टि देखने को मिल सकती है। वहीं उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम के ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फबारी की स्थिति भी बनती है। ऐसे में एक सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है कि आखिर किसी चक्रवाती तूफान का असर कितने किलोमीटर तक हो सकता है?

मौसम प्रणालियों के आकार और तीव्रता के आधार पर चक्रवाती तूफान का प्रभाव लगभग 1000 से 2200 किलोमीटर या उससे अधिक क्षेत्र तक महसूस किया जा सकता है। हालांकि, तूफान का वास्तविक आकार और उसके प्रभाव का क्षेत्र अलग-अलग होता है।

1000 से 2200 किलोमीटर तक हो सकता है तूफान का प्रभाव

किसी चक्रवाती तूफान का प्रभाव उसकी तीव्रता, आकार और आसपास मौजूद मौसमी परिस्थितियों पर निर्भर करता है। एक सामान्य चक्रवाती तूफान का मुख्य व्यास लगभग 480 से 500 किलोमीटर हो सकता है। हालांकि, इसके आसपास फैले बादलों के समूह और बाहरी क्लाउड बैंड काफी दूर तक मौसम को प्रभावित कर सकते हैं।

यही वजह है कि कई बार तूफान का केंद्र एक स्थान पर होने के बावजूद उससे सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों में बारिश, तेज हवाएं और आंधी देखने को मिलती है।

समुद्र से दूर यूपी और मध्य प्रदेश में भी हो सकती है बारिश

चक्रवाती तूफान जब समुद्र से जमीन की ओर बढ़ता है तो उसका असर केवल तटीय इलाकों तक सीमित नहीं रहता। बड़ी मौसमी प्रणालियां समुद्र तट से काफी दूर स्थित राज्यों के मौसम को भी प्रभावित कर सकती हैं।

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी चक्रवाती प्रणाली के प्रभाव से बारिश और तेज हवाएं चल सकती हैं। इसके अलावा वेस्टर्न डिस्टरबेंस जैसी प्रणालियां उत्तर भारत के मौसम में बदलाव लाने में अहम भूमिका निभाती हैं।

दुनिया का सबसे बड़ा तूफान था सुपर टाइफून टिप

दुनिया के सबसे बड़े दर्ज उष्णकटिबंधीय चक्रवातों में सुपर टाइफून टिप का नाम शामिल है। यह तूफान साल 1979 में आया था और इसका व्यास लगभग 2222 किलोमीटर दर्ज किया गया था।

इसका आकार सामान्य चक्रवाती तूफान के 480 से 500 किलोमीटर के अनुमानित व्यास से कई गुना बड़ा था। सुपर टाइफून टिप इस बात का उदाहरण है कि असाधारण परिस्थितियों में एक चक्रवाती प्रणाली कितने बड़े क्षेत्र में फैल सकती है।

जमीन से टकराने के बाद कमजोर क्यों पड़ जाते हैं तूफान?

समुद्र के ऊपर चक्रवाती तूफानों को लगातार नमी और गर्मी मिलती रहती है। यही ऊर्जा उन्हें मजबूत बनाए रखने में मदद करती है। लेकिन जब तूफान समुद्र से जमीन की ओर बढ़ता है तो उसकी नमी और ऊर्जा की आपूर्ति प्रभावित होने लगती है।

इसके अलावा जमीन की सतह पर मौजूद पेड़-पहाड़, इमारतें और अन्य बाधाएं हवा के प्रवाह में घर्षण पैदा करती हैं। इससे तूफान का चक्रवाती परिसंचरण कमजोर होने लगता है।

आमतौर पर जमीन पर पहुंचने के बाद तूफान धीरे-धीरे अपनी ताकत खोने लगता है। हालांकि, उसकी बची हुई नमी और मौसम संबंधी गतिविधियां काफी दूर तक बारिश और तेज हवाओं का कारण बन सकती हैं।

तूफान का व्यास और प्रभाव क्षेत्र में क्या है अंतर?

अक्सर लोग तूफान के आकार और उसके प्रभाव क्षेत्र को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों में अंतर होता है।

  • तूफान का व्यास: यह उस चक्रवाती प्रणाली की मुख्य चौड़ाई को दर्शाता है, जिसके भीतर हवाओं का परिसंचरण होता है।
  • प्रभाव क्षेत्र: इसमें तूफान के बाहरी बादल, बारिश के क्षेत्र और उससे प्रभावित होने वाले दूर-दराज के इलाके भी शामिल होते हैं।
  • मौसम का विस्तार: कई बार तूफान के कमजोर पड़ने के बाद भी उससे जुड़ी नमी और अन्य मौसमी परिस्थितियां बारिश करा सकती हैं।

इसलिए किसी तूफान का प्रभाव उसके मुख्य व्यास से कहीं ज्यादा बड़े क्षेत्र में महसूस किया जा सकता है।

भारत में बारिश, बर्फबारी और ओलावृष्टि के पीछे क्या है वजह?

भारत में जब चक्रवाती प्रणाली और वेस्टर्न डिस्टरबेंस जैसी मौसमी परिस्थितियां एक साथ सक्रिय होती हैं तो देश के अलग-अलग हिस्सों में मौसम तेजी से बदल सकता है।

वेस्टर्न डिस्टरबेंस के कारण उत्तर-पश्चिम भारत और हिमालयी क्षेत्रों में बारिश तथा बर्फबारी की परिस्थितियां बनती हैं। वहीं दूसरी मौसमी प्रणालियां मैदानी इलाकों में बारिश, आंधी और ओलावृष्टि को प्रभावित कर सकती हैं।

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