Rahul Gandhi: हाल ही में, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लेटरल एंट्री योजना पर आलोचना की, जिस पर भारतीय जनता पार्टी (भा.ज.पा.) ने त्वरित और तीखा जवाब दिया। गांधी ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के माध्यम से भर्ती करने के बजाय लेटरल एंट्री के माध्यम से अपने वैचारिक सहयोगियों की नियुक्ति कर रही है और इस प्रक्रिया में एससी, एसटी और ओबीसी के आरक्षण को खतरे में डाल रही है।
लेटरल एंट्री का इतिहास और वर्तमान परिप्रेक्ष्य
लेटरल एंट्री योजना को औपचारिक रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के दौरान पेश किया गया था। इसका उद्देश्य भारत की प्रशासनिक प्रणाली में दक्षता और जवाबदेही को बढ़ाना है। इस योजना के अंतर्गत, विशेष डोमेन विशेषज्ञों को सरकारी पदों पर नियुक्त किया जाता है, जिससे सरकारी कामकाज में नवीनता और विशेषज्ञता लाई जा सके।
यूपीए का योगदान
भा.ज.पा. ने राहुल गांधी की आलोचनाओं का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि लेटरल एंट्री की अवधारणा यूपीए सरकार के समय ही शुरू की गई थी। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने ट्विटर पर कहा, “कांग्रेस का पाखंड स्पष्ट है। यूपीए सरकार ने ही लेटरल एंट्री की अवधारणा को विकसित किया।” वैष्णव ने उल्लेख किया कि दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग (एआरसी), जिसे 2005 में यूपीए सरकार के तहत स्थापित किया गया था, ने इस प्रक्रिया को विकसित किया था।
एआरसी की सिफारिशें
एआरसी ने पहचाना कि कुछ सरकारी पदों के लिए विशेष ज्ञान की आवश्यकता होती है, जो पारंपरिक सिविल सेवाओं में हमेशा उपलब्ध नहीं होता। इस कमी को पूरा करने के लिए, आयोग ने निजी क्षेत्र, शिक्षाविदों, और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से पेशेवरों की भर्ती की सिफारिश की थी। इसके परिणामस्वरूप, लेटरल एंट्री को एक पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से लागू किया गया, जिससे सरकारी सिस्टम में नई सोच और विशेषज्ञता आई।
भविष्य की दिशा
भा.ज.पा. का कहना है कि वर्तमान लेटरल एंट्री प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष है, और इसका उद्देश्य सरकारी प्रणाली में सुधार करना है। पीएम मोदी की सरकार ने इस योजना को लागू करते हुए शासन में सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं।
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