Karnatak news : कर्नाटक में नीट परीक्षा के खिलाफ प्रस्ताव पारित होने का कारण राज्य के ग्रामीण और गरीब छात्रों के प्रति चिंता है। सिद्धारमैया सरकार ने अपने प्रस्ताव में स्पष्ट किया कि नीट परीक्षा प्रणाली ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के लिए एक बड़ी बाधा बन गई है। यह छात्रों को उनके खुद के राज्य में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने से वंचित कर रही है।
नीट परीक्षा प्रणाली की समस्याएं
नीट को लेकर सबसे बड़ी समस्या यह है कि यह परीक्षा केवल एक ही दिन में आयोजित की जाती है और इसमें कठिनाई का स्तर काफी ऊंचा होता है। ग्रामीण और गरीब पृष्ठभूमि के छात्रों को इस परीक्षा के लिए विशेष कोचिंग की आवश्यकता होती है, जो कि उनके लिए महंगी और कठिन है। इससे शहरों में रहने वाले और संपन्न परिवारों के छात्रों को अधिक लाभ मिलता है।
राज्य सरकार का तर्क
राज्य सरकार का मानना है कि नीट परीक्षा प्रणाली राज्य के अधिकारों का हनन करती है। राज्य की सरकारें अपने क्षेत्र की परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार शिक्षा प्रणाली और प्रवेश परीक्षाओं को संचालित करने का अधिकार रखती हैं। नीट इस अधिकार को सीमित करता है और राज्य सरकार द्वारा संचालित मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए राज्य के छात्रों को प्राथमिकता नहीं देता।
केंद्र सरकार पर दबाव
कर्नाटक विधानसभा द्वारा पारित इस प्रस्ताव से केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ेगा कि वह नीट परीक्षा प्रणाली पर पुनर्विचार करे। प्रस्ताव में यह भी मांग की गई है कि राज्य को नीट परीक्षा से छूट दी जाए और मेडिकल एडमिशन के लिए कॉमन एंट्रेंस टेस्ट (सीईटी) के आधार पर छात्रों को प्रवेश दिया जाए।
इस प्रस्ताव के पारित होने के बाद, राज्य सरकार उम्मीद करती है कि केंद्र सरकार इस पर त्वरित कार्रवाई करेगी और राज्य के छात्रों को राहत प्रदान करेगी। कर्नाटक विधानसभा का यह कदम शिक्षा प्रणाली में सुधार और अधिक समावेशी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।
