नई दिल्ली: दुनिया में मुद्रा और आर्थिक व्यवस्था को लेकर लगातार बदलाव हो रहे हैं। एक ओर BRICS देशों के बीच डी-डॉलराइजेशन यानी अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर चर्चा होती रही है, तो दूसरी ओर कुछ देश अपनी राष्ट्रीय मुद्रा छोड़कर किसी दूसरी मुद्रा को अपना चुके हैं। बुल्गारिया ने 1 जनवरी 2026 को अपनी मुद्रा लेव की जगह यूरो अपना लिया।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कोई देश अपनी करेंसी को पूरी तरह बंद करके अमेरिकी डॉलर, यूरो या किसी अन्य देश की मुद्रा को अपने यहां कानूनी मुद्रा बना सकता है? इसका जवाब है हां। किसी देश के पास ऐसा करने का विकल्प हो सकता है, लेकिन इसके लिए घरेलू कानूनों, आर्थिक परिस्थितियों और वित्तीय व्यवस्था से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार करना पड़ता है।
क्या कोई देश अपनी करेंसी पूरी तरह बंद कर सकता है?
किसी देश द्वारा अपनी राष्ट्रीय मुद्रा को छोड़कर विदेशी मुद्रा को आधिकारिक रूप से अपनाने की प्रक्रिया को आमतौर पर ‘फुल डॉलराइजेशन’ या व्यापक अर्थ में विदेशी मुद्रा अपनाना कहा जाता है। हालांकि, इसमें अमेरिकी डॉलर के अलावा किसी अन्य देश की मुद्रा को भी अपनाया जा सकता है।
क्या इसके लिए दूसरे देश की अनुमति जरूरी है?
किसी देश द्वारा विदेशी मुद्रा को एकतरफा अपनाने के लिए आमतौर पर उस मुद्रा को जारी करने वाले देश के साथ विशेष मौद्रिक समझौता करना अनिवार्य नहीं होता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर परिस्थिति में कोई कानूनी या व्यावहारिक बाधा नहीं होगी।
यदि कोई देश अमेरिकी डॉलर को अपनी आधिकारिक मुद्रा बनाता है, तो वह अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नियंत्रण में नहीं आ जाता और न ही उसे अमेरिकी मौद्रिक नीति तय करने का अधिकार मिलता है। डॉलर जारी करने और उसकी मौद्रिक नीति निर्धारित करने की जिम्मेदारी अमेरिका की ही रहती है।
दूसरी ओर, बुल्गारिया का यूरो अपनाना एक अलग उदाहरण है। उसने यूरोपीय संघ के निर्धारित नियमों और संस्थागत प्रक्रिया के तहत यूरो क्षेत्र में प्रवेश किया। इसलिए विदेशी मुद्रा को एकतरफा अपनाने और किसी साझा मुद्रा संघ में शामिल होने के बीच अंतर समझना जरूरी है।
आखिर क्यों अपनी करेंसी छोड़ते हैं देश?
कोई देश अपनी मुद्रा छोड़ने का फैसला कई आर्थिक कारणों से कर सकता है। अक्सर इसके पीछे लंबे समय से चली आ रही महंगाई, मुद्रा का तेजी से गिरता मूल्य और आर्थिक व्यवस्था पर लोगों का कमजोर होता भरोसा जैसे कारण होते हैं।
1. बेकाबू महंगाई से राहत की उम्मीद
जब किसी देश में कीमतें बहुत तेजी से बढ़ती हैं और उसकी मुद्रा की क्रय शक्ति लगातार गिरती है, तो लोग अपनी बचत सुरक्षित रखने के लिए विदेशी मुद्रा की ओर रुख कर सकते हैं। अत्यधिक और लगातार बढ़ती महंगाई की स्थिति को हाइपरइन्फ्लेशन कहा जाता है। ऐसे हालात में विदेशी मुद्रा अपनाना सरकार के लिए एक विकल्प बन सकता है।
2. घरेलू मुद्रा पर भरोसा कम होना
यदि लोगों और कारोबारियों को लगता है कि उनकी राष्ट्रीय मुद्रा का मूल्य लगातार गिर सकता है, तो वे बचत, कारोबार और बड़े लेनदेन के लिए डॉलर या किसी अन्य अपेक्षाकृत स्थिर मुद्रा का इस्तेमाल करना पसंद कर सकते हैं। कुछ देशों में यह प्रक्रिया आधिकारिक निर्णय से पहले ही अनौपचारिक रूप से शुरू हो जाती है।
3. विदेशी निवेश आकर्षित करना
विदेशी मुद्रा अपनाने से घरेलू मुद्रा के अवमूल्यन का जोखिम कम हो सकता है। इससे कुछ परिस्थितियों में विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ने और विदेश से कर्ज लेने की लागत घटने की संभावना रहती है। हालांकि, इसका लाभ देश की आर्थिक नीतियों, वित्तीय स्थिरता और वैश्विक परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
करेंसी बदलने के क्या हैं फायदे?
विदेशी मुद्रा को आधिकारिक रूप से अपनाने का सबसे बड़ा संभावित फायदा मुद्रा के तेजी से अवमूल्यन से जुड़े जोखिम को कम करना है। इससे कारोबारियों को अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में मुद्रा बदलने की जरूरत और उससे जुड़ी कुछ लागतों से राहत मिल सकती है।
इसके अलावा, यदि नई मुद्रा अपेक्षाकृत स्थिर है, तो महंगाई पर नियंत्रण और निवेशकों का भरोसा बढ़ाने में मदद मिल सकती है। लेकिन विदेशी मुद्रा अपनाने से महंगाई अपने आप खत्म नहीं होती। देश की राजकोषीय स्थिति, उत्पादन, रोजगार और बैंकिंग व्यवस्था भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राष्ट्रीय करेंसी छोड़ने के बड़े नुकसान भी हैं
अपनी मुद्रा छोड़ने का फैसला जितना बड़ा है, उससे जुड़े जोखिम भी उतने ही गंभीर हो सकते हैं।
- मौद्रिक नीति पर नियंत्रण खत्म: देश अपनी जरूरतों के अनुसार स्वतंत्र रूप से ब्याज दरें और मुद्रा आपूर्ति तय नहीं कर सकता।
- संकट के समय सीमित विकल्प: आर्थिक मंदी के दौरान मुद्रा का अवमूल्यन करके निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाने का विकल्प उपलब्ध नहीं रहता।
- केंद्रीय बैंक की सीमाएं: घरेलू मुद्रा जारी करने की क्षमता न होने पर केंद्रीय बैंक के लिए बैंकिंग संकट के समय अतिरिक्त नकदी उपलब्ध कराना अधिक कठिन हो सकता है।
- मुद्रा जारी करने से होने वाली आय का नुकसान: अपनी मुद्रा जारी करने से मिलने वाली आय यानी सीनियोरेज का लाभ देश को नहीं मिलता।
क्या भारत भी कभी ऐसा कर सकता है?
सैद्धांतिक रूप से विदेशी मुद्रा अपनाना कई देशों के लिए एक विकल्प हो सकता है, लेकिन भारत जैसे बड़े और विविध अर्थव्यवस्था वाले देश के लिए ऐसा फैसला बेहद व्यापक आर्थिक और संस्थागत बदलाव की मांग करेगा।
भारत की अपनी मुद्रा रुपया है और भारतीय रिजर्व बैंक देश की मौद्रिक नीति संचालित करता है। यदि भारत कभी रुपये को पूरी तरह छोड़ने पर विचार करे, तो उसे मौद्रिक स्वायत्तता, बैंकिंग व्यवस्था, सरकारी वित्त, व्यापार और आर्थिक स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों का गंभीर आकलन करना होगा।
