रेबीज का इलाज क्यों है इतना मुश्किल? लक्षण दिखने के बाद क्यों बन जाती है जानलेवा बीमारी

Health News: रेबीज एक गंभीर वायरल बीमारी है, जो संक्रमित जानवर की लार के संपर्क में आने, खासकर काटने या खरोंचने से फैल सकती है। दुनिया भर में हर साल हजारों लोगों की मौत इस बीमारी के कारण होती है। रेबीज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि एक बार इसके लक्षण शुरू हो जाने के बाद बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा साबित होती है। हालांकि, समय पर घाव की सफाई, रेबीज वैक्सीन और जरूरत पड़ने पर रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) की मदद से संक्रमण को रोका जा सकता है।

रेबीज का इलाज ढूंढना क्यों है बड़ी चुनौती?

रेबीज का वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद परिधीय नसों के जरिए केंद्रीय तंत्रिका तंत्र यानी दिमाग और रीढ़ की हड्डी तक पहुंच सकता है। वहां पहुंचने के बाद यह तंत्रिका कोशिकाओं को गंभीर नुकसान पहुंचाता है। इस अवस्था में बीमारी को नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो जाता है।

दिमाग की सुरक्षा करने वाली एक प्राकृतिक व्यवस्था को ब्लड-ब्रेन बैरियर कहा जाता है। यह कई हानिकारक पदार्थों को दिमाग तक पहुंचने से रोकती है, लेकिन कुछ दवाओं और प्रतिरक्षा से जुड़े तत्वों के लिए भी दिमाग तक पहुंचना कठिन बना सकती है। इसके अलावा, वायरस के तंत्रिका तंत्र में पहुंचने के बाद शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से संक्रमण को पूरी तरह नियंत्रित करना आसान नहीं होता।

इसी कारण वैज्ञानिक ऐसे प्रभावी उपचार विकसित करने पर काम कर रहे हैं, जो रेबीज के लक्षण शुरू होने के बाद भी मरीज की जान बचा सकें।

रेबीज के लक्षण शुरू होने के बाद क्यों बढ़ जाता है खतरा?

रेबीज के शुरुआती लक्षण सामान्य बुखार जैसी बीमारी से मिलते-जुलते हो सकते हैं। इनमें बुखार, सिरदर्द, कमजोरी और काटे गए स्थान पर दर्द, खुजली या झुनझुनी शामिल हैं।

बीमारी बढ़ने पर मरीज को बेचैनी, भ्रम, निगलने में परेशानी, पानी पीने की कोशिश करने पर ऐंठन, अत्यधिक उत्तेजना या लकवे जैसी समस्याएं हो सकती हैं। गंभीर मामलों में सांस लेने और हृदय की कार्यप्रणाली पर भी असर पड़ सकता है।

जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक वायरस अक्सर केंद्रीय तंत्रिका तंत्र तक पहुंच चुका होता है। इसी वजह से लक्षण शुरू होने के बाद रेबीज का प्रभावी इलाज बेहद कठिन हो जाता है और बीमारी लगभग हमेशा जानलेवा होती है।

क्या मिल्वौकी प्रोटोकॉल से ठीक हो सकता है रेबीज?

रेबीज के इलाज के लिए मिल्वौकी प्रोटोकॉल जैसी प्रायोगिक उपचार पद्धतियों को आजमाया गया है। हालांकि, यह उपचार रेबीज का भरोसेमंद या प्रमाणित इलाज नहीं माना जाता। लक्षण शुरू होने के बाद मरीज के बचने की संभावना बेहद कम रहती है।

इसलिए रेबीज से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है कि संभावित संक्रमण के तुरंत बाद चिकित्सा सहायता ली जाए। लक्षणों का इंतजार करना खतरनाक हो सकता है।

कुत्ते या किसी अन्य जानवर के काटने पर क्या करें?

यदि किसी कुत्ते, बिल्ली, बंदर या अन्य स्तनधारी जानवर ने काट लिया है या खरोंच दी है, तो तुरंत ये कदम उठाएं:

  1. घाव को 15 मिनट तक धोएं: साबुन और बहते पानी से घाव को अच्छी तरह साफ करें।
  2. तुरंत डॉक्टर के पास जाएं: घाव छोटा होने पर भी चिकित्सा सलाह लेने में देरी न करें।
  3. रेबीज वैक्सीन लगवाएं: डॉक्टर की सलाह के अनुसार वैक्सीन की पूरी खुराक समय पर लें।
  4. RIG की जरूरत जांचें: गंभीर संपर्क या श्रेणी-3 के संपर्क में डॉक्टर रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन की सलाह दे सकते हैं।
  5. घरेलू उपचार पर निर्भर न रहें: मिर्च, तेल, हल्दी या अन्य घरेलू पदार्थ लगाकर इलाज में देरी न करें।

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