श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के महासचिव चंपत राय ने हाल ही में तिरुपति मंदिर के प्रसिद्ध लड्डू प्रसादम में फिश ऑयल और जानवरों की चर्बी मिलाने के विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस मुद्दे को पुराना बताते हुए उचित जांच की मांग की, ताकि सच सामने आ सके। चंपत राय का कहना है कि उन्हें इस मामले में सीधे तौर पर कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं, क्योंकि उनका प्रसाद से कोई संबंध नहीं है, लेकिन जांच की आवश्यकता पर जोर दिया।
तिरुपति मंदिर लड्डू विवाद पर प्रतिक्रिया
चंपत राय ने कहा, “मेरा प्रसाद से कोई संबंध नहीं है। मैं तो प्रसाद में केवल इलायची का दाना देता हूं। मैंने 1981 में तिरुपति मंदिर की यात्रा की थी। सोशल मीडिया और मीडिया में आई कुछ खबरों के आधार पर मैं किसी पवित्र मंदिर पर टिप्पणी नहीं कर सकता। यह खबर जिनसे संबंधित है, वे स्वयं इसका उत्तर देंगे।” उन्होंने कहा कि तिरुपति मंदिर और उसके प्रसाद के विवाद को सही संदर्भ में समझने की जरूरत है। चंपत राय ने इस बात पर भी जोर दिया कि जिस समय यह विवादित मुद्दा सामने आया है, उस समय प्रशासनिक स्थिति और लड्डू बनाने का कॉन्ट्रैक्ट किसे दिया गया था, यह सब जांच का विषय है।
जांच की आवश्यकता पर जोर
चंपत राय ने कहा कि उन्हें इस विषय पर टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि यह उनके कार्यक्षेत्र का हिस्सा नहीं है। हालांकि, उन्होंने इस मामले में गहन जांच की मांग की ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह विवाद कहां से उत्पन्न हुआ और किस समय का मामला है। उन्होंने कहा, “यह जांच का विषय है कि उस समय प्रशासन कौन चला रहा था और लड्डू बनाने का जिम्मा किसे दिया गया था। बिना जांच के किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।”
तिरुपति मंदिर का महत्व
तिरुपति वेंकटेश्वर मंदिर, जिसे तिरुमला, तिरुपति बालाजी मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले के पहाड़ी शहर तिरुमला में स्थित है। यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित है। इस मंदिर का महत्व हिंदू धर्म में अत्यधिक है, क्योंकि इसे कलियुग का वैकुंठ माना जाता है, जहाँ भगवान वेंकटेश्वर मानव जाति को उनके कष्टों से उबारने के लिए प्रकट हुए थे।
तिरुपति मंदिर का ऐतिहासिक योगदान
इस मंदिर का इतिहास सदियों पुराना है और इसके निर्माण में कई राजवंशों का योगदान रहा है। खासकर चोल, होयसल और विजयनगर के राजाओं ने इस मंदिर के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मंदिर के प्रसाद का इतिहास भी लगभग 300 साल पुराना है। यह प्रथा वर्ष 1715 के आसपास शुरू हुई थी, जिसे 2014 में “जाइ टैग” (GI Tag) भी प्राप्त हुआ, जिससे इसकी पवित्रता और गुणवत्ता को मान्यता मिली।
तिरुपति मंदिर के लड्डू प्रसादम में फिश ऑयल और जानवरों की चर्बी मिलाने के आरोपों पर चंपत राय ने स्पष्ट रूप से जांच की मांग की है। उन्होंने इस विवाद पर किसी भी तरह की टिप्पणी से बचते हुए कहा कि यह एक पुराना मामला है और इसके पीछे के प्रशासनिक तथ्यों को सामने लाने के लिए जांच जरूरी है। तिरुपति मंदिर का धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व अत्यधिक है, और इस विवाद के चलते लोगों की आस्था को ठेस न पहुंचे, इसके लिए उचित कार्रवाई की आवश्यकता है।
