हरियाणा विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नजरें टिकी हैं। सभी राजनीतिक दल पूरी ताकत के साथ मैदान में उतर चुके हैं, लेकिन एक बड़ा चेहरा, राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रीय राज्यमंत्री जयंत चौधरी, इस चुनावी जंग से गायब हैं। सवाल उठ रहे हैं कि जयंत चौधरी ने हरियाणा में चुनाव लड़ने से क्यों दूरी बना ली, और क्या इसके पीछे किसान आंदोलन से दूरी या कुछ और वजह है?
हरियाणा से दूरी, जम्मू-कश्मीर पर फोकस
जयंत चौधरी का हरियाणा चुनाव में हिस्सा न लेना चर्चा का विषय बना हुआ है। यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब आरएलडी ने 750 किलोमीटर दूर जम्मू-कश्मीर में 12 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। क्या यह आरएलडी की बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, या फिर बीजेपी के साथ गठबंधन की मजबूरी? हरियाणा में चुनाव न लड़ने के फैसले पर अब कई सवाल खड़े हो रहे हैं। जयंत की गैरमौजूदगी ने हरियाणा की राजनीति में एक खालीपन पैदा किया है।
बीजेपी के साथ गठबंधन की मजबूरी?
आरएलडी के राष्ट्रीय महासचिव त्रिलोक त्यागी ने इस बारे में स्पष्ट किया कि पार्टी ने बीजेपी के साथ गठबंधन में चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। उन्होंने कहा, “हम बीजेपी के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी में थे, अकेले नहीं। जब बीजेपी ने हरियाणा में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो हम इस फैसले के साथ खड़े हो गए। वहीं, जम्मू-कश्मीर में हमने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया, जिसे बीजेपी ने समर्थन दिया।”
त्यागी ने यह भी कहा कि हरियाणा में चुनाव न लड़ना पार्टी की रणनीति का हिस्सा है और इसका गठबंधन के साथ संबंध है।
जयंत का बड़ा फैसला, सियासी मायने
आरएलडी के राष्ट्रीय महासचिव राजेंद्र शर्मा ने भी कहा कि जयंत चौधरी ने हरियाणा में चुनाव न लड़ने का फैसला पूरी सोच-समझ के साथ लिया है। उन्होंने कहा, “हर सियासी कदम के मायने होते हैं। हम बीजेपी के साथ गठबंधन में हैं, इसलिए हमें चुनाव लड़ाने पर ध्यान देना पड़ा, न कि खुद चुनाव लड़ने पर। यही वजह है कि हमने हरियाणा में प्रत्याशी नहीं उतारे और बीजेपी ने सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया।”
किसान आंदोलन से दूरी और जाटों की नाराजगी
वरिष्ठ पत्रकार पुष्पेंद्र शर्मा के अनुसार, जयंत चौधरी की हरियाणा चुनाव से दूरी का एक बड़ा कारण किसान आंदोलन में उनकी मजबूती से शामिल न होना भी हो सकता है। शर्मा ने कहा, “किसान आंदोलन में जयंत चौधरी की भूमिका सीमित रही, जिससे किसान और जाट समुदाय नाराज हैं। ऐसे में जयंत हरियाणा में कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहते, जिससे उनकी भविष्य की राजनीति प्रभावित हो।”
शर्मा ने यह भी कहा कि बीजेपी के अनुशासन और गठबंधन धर्म के तहत जयंत को हरियाणा चुनाव से दूरी बनानी पड़ी। इस फैसले के पीछे उनका यह भी मानना है कि जयंत चौधरी अब बीजेपी के साथ सौदेबाजी की स्थिति में नहीं हैं, और उन्हें गठबंधन के नियमों का पालन करना पड़ा।
हरियाणा चुनाव में आरएलडी की गैरमौजूदगी
हरियाणा विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है, लेकिन जयंत चौधरी का “हैंडपंप” चुनावी मैदान से गायब है। जयंत चौधरी के हरियाणा चुनाव से दूर रहने के पीछे कई राजनीतिक मजबूरियां और रणनीतियां हो सकती हैं। बीजेपी के साथ गठबंधन, किसान आंदोलन से दूरी, और जाट समुदाय की नाराजगी ने जयंत को हरियाणा की राजनीति से पीछे हटने पर मजबूर किया है।
आगे देखना यह होगा कि जयंत चौधरी का यह फैसला उनकी राजनीति पर किस तरह का प्रभाव डालता है, और क्या यह आरएलडी के लिए भविष्य में लाभकारी सिद्ध होगा।
